#Kavita by Roopesh Jain

पाने की चाह

पाने की चाह में

खोने का डर सताता है

बिना कुछ पाये ही

दिल सहम जाता है

फ़ितरत में जुड़ा है

ये डर जाना सहम जाना

रुका था न रुकेगा

इंसाँ का बहक जाना

लाख दुआएं कर लो

फिर भी फ़ितरत न मिटेगी

ये ज़ोफ़-ए-इंसाँ है

जनाज़े तक रहेगी

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

शब्दार्थ:

१. ज़ोफ़-ए-इंसाँ- मनुष्य की कमजोरी

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