#Kavita By S B S Yadvesh

महिला दिवस

नारी तुम कब तक बदलेगी ?

लव कुश भटक रहा बन बन में
न्याय की अपने गुहार कर रहा
होकर नाथ अनाथ की तरह
बाप बाप धिक्कार कर रहा
बन कर तुम चरणों की दासी
पतिव्रत धर्म भूल नहीं पाती
कब तक तुम सीता बनकर के
राम का अत्याचार सहोगी
नारी तुम कब तक बदलेगी ?

धार्मिक कर्मकांडों से नारी
जुड़ी रहोगी जब तक
न्याय और सम्मान जगत में
नहीं मिलेगा तब तक
नारायण नर तेरे हित
स्थान किया जो व्यवस्थित
पढ़ अतीत के पन्नों को
तुम कहीं नहीं हो सुगर्वित
एक देवता भेष बदलकर
अर्ध रात्रि में छलता
एक देवता कठिन श्राप दे
काया पत्थर करता
एक देवता पग ठोकर दे
मुक्त मार्ग दिखलाता
एक देवता नाँक काट कर
जग उपहास कराता
एक देवता जुँवा हारकर
चीरहरण करवाता
एक देवता कम दहेज से
जिंदहि चिता जलाता

लगता देवता शब्द जना है
नारी के छलने को
हो तैयार अस्तित्व के लिए
नया मार्ग चुनने को
किसने की दुर्दशा तुम्हारी
कौन गुनह का दोषी
कब तक अत्याचार सहोगी
बन करके सन्तोषी
नव साहित्य नई संस्कृति से
निर्भय किस्मत कब लिखोगी
नारी तुम कब तक बदलेगी ?

ननद बनी तो भौजाई की
तुमने उखाड़ी चोटी
बहू बनी तो सासु न पायी
कभी पेट भर रोटी
जननी वन कन्या भ्रूणों को
कोखहि में निपटाया
सास बनी तो तुमने बहू पर
जमकर हुकुम चलाया
नारी होकर नारी के
नारी का दर्द न जाना
नारी तूने हर रूपों में
नारी को ही घाना
नफरत रूपी चिता जलाकर
तुम सशक्त हो कब उभरोगी
नारी तुम कब तक बदलोगी ?

नारी समाज पतन को रोको
दिल से नहीं दिमाग से सोचो
मर्दों का शिकार कहाँ पर
औरत का श्रृंगार जहाँ पर
स्वाभिमान सम्मान के लिए
घूँघट का पट खोल हटा दो
बुर्खों को तुम आग लगा दो

सानियाँ मिर्जा भेष बनाकर
सुनीता विलियन्स छलाँग लगा दो
मायावती सोनिया बनकर
जयललिता ममता की हवा दो
वक्त कहीं पर निकल न जाये
प्रगति तुम्हारे इंतजार में
नैन बिछाये राँह निहारे
यादवेश बन्दन को आये
नारी कब घर से निकलेगी
नारी तुम कब तक बदलोगी ?

यादवेश

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