#Kavita by S B S Yadvesh

अजमता बीज

मेरी चर्चित एवं तार्किक  कविता

 

तू है ही नहीं तेरी क्या गाऊँ ?

अजमता है बीज उसे मैं क्यों बोऊँ ?

 

तू होती  ? तो स्याही कलम दवात न होती

क्यों मैं पढ़ता  ?क्यों कोई किताब ही होती

दोहरानों में व्यर्थ समय नहीं जाता

अजमता है बीज उसे मैं क्यों बोऊँ ?

तू है ही नहीं तेरी क्या गाऊँ ?

 

तू होती  ? तो हीन’ न होते

हम भी किसी के अधीन न होते

उठ-बैठक दे निर्लज होकर

गुरुजन पैर में न छूता

अजमता है बीज उसे मैं क्यों बोऊँ ?

तू है ही नहीं तेरी  क्या गाऊँ ?

 

तू होती  ? नफरत नहीं होती

संप्रदायिकता की बात न होती

वसुधैव कुटुम्बकम् का नारा

नहीं माथ पटक कर रोता ?

अजमता है बीज उसे मैं क्यों बोऊँ ?

तू है ही नही तेरी  गाऊँ ?

 

तू होती ? तो मंदिर मस्जिद चर्च न होते

तकनीकों  की हम भी कोई रिसर्च न करते ?

जीवन को जिंदा रखने में कत्लेआम न करता

अजमता है बीज उसें मैं क्यों बोऊँ ?

तू है ही नहीं तेरी  क्या गाऊँ ?

 

यादवेश

 

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