#Kavita by S B S Yadvesh

बिष नाग निकले हैं  ?

***

 

बसंती ठप बयारें हैं ,

तपिस पछुआ की वारें हैं

बचे रहना , बिलों से बिलबिला

बिष नाग निकले है

 

मैं पोषक था , पल रहे थे

मेरे अस्तीन के अंदर

खबर क्या थी  ? फनफना कर

करेंगे वार ही मुझ पर

बचे रहना ,  तुम्हें डसने को

काले नाग निकले हैं

बचे रहना ,बिलों से बिलबिला

विष नाग निकले हैं

 

बब्बर शेरों ,को डसने की नहीं

हिम्मत कभी इनमें

ऊंचे महलों में घुसने की नहीं

हिम्मत रही है इनमे

झोपड़ी, झुग्गियां , खलियान में

अक्सर ये दिखते हैं

बचे रहना ,बिलो से बिलबिला

बिष नाग निकले हैं

 

भाईचारा ! निगलकर के

विषमता की हवा देंगे

नफरतों को उगल करके

अमन की जान ले लेंगे

समृद्धि सुख खत्म करने को

ये आवारा निकले है

बचे रहना ,बिलों से बिल बिला

बिष नाग निकले हैं

 

दवाई खोजता हूँ ! जो जला दे

इनकी जालों को

सपेरा हूँ ! समझता हूँ !

मैं इनकी दूषित चालों को

सजग रहना ! मिटाने को

तुम्हें यह जड़ से निकले  हैं

बसंती  ठप बयारे हैं

तपिस पछुआ की वारें हैं

बचे रहना बिलो से बिल बिला

बिष नाग निकले है  –  यादवेश

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