#Kavita by Salil Saroj

बहुत रहे चुप्प तुम,पर अब और नहीं रह पाओगे,

अपनी ही बच्ची का नंगा बदन तुम देख नहीं पाओगे।

 

रौंद डाले कितनी ही औरतों की इज़्ज़त बारहां,

अपनी बहनों का कटा हुआ सीना तुम देख नहीं पाओगे।

 

बहुत बस्तियाँ जलाईं, कई घर बर्बाद किए तुमने,

पर दंगों में अपना घर धू-धू जलता तुम देख नहीं पाओगे।

 

बहुत रोटियाँ सानी हैं मासूमों के खून से अब तक,

अपने ही चूल्हे में यूँ जिंदा लाश तुम देख नहीं पाओगे।

 

रातों को हथियारों से खूब काटा है रोज़ तुमने,

सूरज से दिन भर टपकता खून तुम देख नहीं पाओगे।

 

दरिया,पहाड़,रास्ते,नाले,किसी को नहीं छोड़ा,

खुद की परछाई को डरता हुआ तुम देख नहीं पाओगे।

सलिल सरोज

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