#Kavita by Salil Saroj

तुम मुझे मेरी नींद में मिलना,

मैं वहाँ हज़ारों ख्वाब बेचता हूँ,

मेरे साथ-साथ ही फिर चलना,

हँसी-मुस्कुराहटों के बाग सीचता हूँ,

खुशबू की तरह से फ़िज़ा में घुलना,

मैं हाथों से अपनी दोनों आँखें मीचता हूँ।

ओंस के कपड़े को जब तुम बदलना,

मैं भाप की लंबी सी चादर खीचता हूँ।

दुधिया रोशनी में बेइंतहा पुरजोर खिलना,

मैं शर्म से अपने होंठों को भींचता हूँ।

चोरी-चोरी ही सही तुम ख्वाहिशों में चलना,

मैं जादूगर हूँ,रूमानियत की दुनिया रचता हूँ।

सलिल सरोज

 

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