#Kavita by Salil Saroj

काश कि कभी

हमें भी बुलाया होता

तुमने अपनी सभाओं में

जहाँ तुम

गद्देदार कुर्सियों में धँसकर

वातानुकूलित कमरों में जमकर

हमारे लिए

परेशान होते हो

टी वी पर हमें

चिलचिलाती धूप में

जलता देखकर

हैरान होते हो

जहाँ हमें बचाने के लिए

तुम गीत गाते हो

नाचते हो

जश्न मनाते हो

और

घर जाकर सब भूल जाते हो

 

हमें बुलाते तो

हम बताते कि

सबका कारण तुम्हीं हो

अपनी लालच में

तुम सब भूल गए हो

धरती का सीना चीरकर

सारा खून पी गए हो

नदियों के माथे का

सिंदूर पोछते भी गए हो

और

हवाओं की ज़ुबाँ तक को

धुआँ के नस्तर से सी गए हो

 

सलिल सरोज

 

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