#Kavita by Salil Saroj

मैंने जमा कर रखे हैं

तुम्हारी कुछ चीज़ें

मेरे शहर दिल्ली आना

तो ले जाना

 

वो सूनी रातों में

बल्लीमारां की गलियों की सैर

नियोन लाइट में घटों

तुम्हारे चेहरे का देखते जाना

और

तुम्हारा उकता कर पूछना-

“चाँद को देखा तो फिर मुझे देखोगे क्या?”

और मेरा टकटकी बाँध कर कहना-

“तुम्हारे सामने कोई चाँद टिकेगा क्या?”

 

वो भोर पहर में

जब सारा शहर सोया था

सोई हुई सड़कों पर

बारिश ने दो जिस्मों को धोया था

तुम्हारा सिहर कर मझमें सिमटते जाना

और कहना-“ये आग कहाँ से लगती है

ये जिस्म कहाँ से जलता है

ये पानी है या शरारा कोई

कि मोम की तरह दो जिस्म पिघलता है”

तुम्हें बाँहों के घेरे में भर के

मेरा ये कहना-“ये आग खुद तुमने ही लगाई है

बारिश की बूँदों को शरारत सिखाई है

जो छू लिए तुम्हें बेवजह

बस फिर अल्लाह दुहाई है।”

 

वो जून की भरी दोपहरी में

हाथों में हाथ डाले

कभी मेट्रो,कभी बस

और कभी पैदल ही

यूँ ही बस चलते जाना

तुम्हारे आँखों के काजल से कहते जाना-

“काश कि मैं इन निगाहों में कैद हो पाता

इन्हीं के साथ सोता और जागता

और किसी रोज़ आँसू के साथ

सुर्ख रुखसार पे छलक जाता”

और

फिर उसी नाज़ों-हया से तुम्हारा कहना-

“ये काजल,चूड़ी,बिंदी,गहने,पाज़ेब

सब गैर-मतलबी हैं

एक तुम्हारा दिल,एक मेरा दिल

और बाकी जहाँ सारा अजनबी है।”

 

वो आखिरी विदाई पर बने

तुम्हारे नाख़ून के निशाँ अब भी ज़िन्दा हैं

मेरी रूह में कैद जैसे कोई परिंदा है

बहुत कोशिश कि ये भी छूट जाए

लेकिन क्या करूँ इसमें भी

तेरी यादों का पुलिंदा है

लब खामोश थे किसी मीनार की तरह दोनों के

पर निगाहें बेइन्तहां बातें किए जा रही थी कि-

“क्यूँ हुआ ऐसा मिलना कि यूँ बिछड़ना पड़े

इतना मत मनाओ कि बिगड़ना पड़े

बहुत आज़िज़ किया मैंने अपने दिल को

कोई सूरत नहीं बची कि फिर जुड़ना पड़े”

पत्थर गर बोलता तो मुझसा ही बोलता-

“खुद ही कई हिस्सों में बँट गया हूँ मैं

अपनी आत्मा से जैसे कट गया हूँ मैं

ताउम्र उसी शिद्दत से तुम्हारा इंतज़ार करूँगा

भले ही

क्षितिज तक पहुँच कर

किसी मेघ सा फट गया हूँ  मैं”

सलिल सरोज

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