#Kavita by Salil saroj

सम्मान स्त्री का शेष है
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की घाटियों में,
कमर पर हाथ रखी स्त्री का जो अवशेष है,
मलिन सा चेहरा और बिंधा हुआ जो केश है,
वो उसका स्वभाव नहीं, उसका आवेश है,
क्योंकि सम्मान स्त्री का शेष है।

वेदों और पुराणों का द्वार जिस पर खुला नहीं,
चाक पर तो गढ़ी गयी, पर आकार सुदृढ़ मिला नहीं,
आधार थी जो, उसका ही जीवन खिला नहीं,
रची जिसने सभ्यता, उसका ही अस्तित्व मिला नहीं
क्योंकि सम्मान स्त्री का शेष है।

कुंती की व्यथा, सीता की पीड़ा,
द्रौपदी का रुदन, सावित्री सी अधीरा,
वो रही हो आर्या, या बनी हो द्रविड़ा,
रही हो कृष्ण की राधा, या हो मीरा,
हृदय के सागर में ज्वालामुखी सा रोष है,
क्योंकि सम्मान स्त्री का शेष है।

निर्भया का भय, लक्ष्मी की लाचारी,
बनाती हैं इनको व्यभिचार की अधिकारी,
इतिहास से वर्तमान तक फैली है त्राहि,
चलती तो हैं साथ,परन्तु बन नहीं पाती हमराही
क्योंकि सम्मान स्त्री का शेष है।

– सलिल सरोज

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