#Kavita by Sandeep Saras

बेटियां🔴

 

कोख से अब जन्म लेतीं, बेटियां मत छीनिए।

गुनगुनाने दो,चमन से, तितलियां मत छीनिये।

 

घर बदलती हैं मगर यह दिल बदलती हैं नहीं,

आप घर से प्रेम की ये खिड़कियां मत छीनिये।

 

आप नारी शक्ति का सम्मान करना सीखिए,

आसमां की ओर बांधी मुट्ठियां मत छीनिये।

 

बेटियां भी आज बेटों से कहाँ उन्नीस हैं,

ब्याहकर बेवक्त इनकी मस्तियां मत छीनिये।

 

खिलखिलाहट से घरों को सींचती है बेटियां

आप घर आँगन सजाती नेकियाँ मत छीनिये।

 

आप बेटी को पढ़ाएं रूढ़ियों को छोंड़ दें,

बेवजह मासूम सी अठखेलियाँ मत छीनिये।

 

दो घरों में प्रेम की ये पाठशालाएं बनें,

सृष्टि संचालक हमारी हस्तियां मत छीनिये।

 

【 संदीप ‘सरस’ 】

■कवि,साहित्यकार/समीक्षक

■साहित्य सम्पादक-दैनिक राष्ट्र राज्य

■संयोजक-साहित्य सृजन मंच

■पता-मो-शंकरगंज,पोस्ट-बिसवां

जिला-सीतापुर(उ प्र)-(पिन-261201)

■मोबा【9450382515】【9140098712】

 

 

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