#Kavita by Sandeep Saras

माँ  पे  छंद लिखते ही शब्दशून्य हो गया हूँ,

पंछी   कोई  जैसे   पर-हीन  हुआ  जाता है।

 

मनुहार   की   फुहार  कैसे  डालूँ  बार  बार,

नेहिल – निषंग   शर – हीन   हुआ  जाता  है।

 

चरण  पखारूं  किस  भांति  बतलाएं  आप,

अभिभूत   तन   कर – हीन  हुआ  जाता  है।

 

माँ की वन्दना भला  बताएं  कैसे  हो सकेगी,

हर्षलब्ध  कण्ठ  स्वर – हीन  हुआ  जाता  है।

 

संदीप सरस~9450382515

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