#Kavita by Sandeep Vashishth

*मेरा मन बंजारा क्यों है*

 

सुख सुविधाओं की नगरी में मेरा मन बंजारा क्यों है?

पानी लिए उडा जो फिरता बादल सा आवारा क्यों है।

क्यों सिन्धु से अलग घूमता लिए सरोवर जितना पानी,

यहाँ तपिश ही उसको मिलनी जो होता बादल सा दानी।

तभी एक पंछी ने उडकर मुझको बस इतना समझाया,

बिन पंखो के  बादल ही तो अवनी से अम्बर तक आया।

कभी किसी चातक को बोलो कब बादल से ऊपर देखा,

बादल तक ही खत्म हुई है सदा  उडानों की बस रेखा।

बोलो कब भू पर प्यासे को सिन्धु खुद चलकर आया है ,

उसने तो अपना आसुत जल बादल से ही भिजवाया है।

जब भी तपिश बढी है भू पर या सूरज का क्रोध बढा है,

सूरज को दर्पण दिखलाने बादल हसकर दोड पडा है ।

तुझे यहाँ पर बादल सम ही दूर-दूर तक छा जाना है,

धरती पर सारे जीवों को हसकर पानी पहुंचाना है।

सूरज और सिन्धु का तुझको अब ये कर्ज चुकाना है,

ना धरती पर रुक जाना है अंबर पर  मंडराना है।।

 

संदीप वशिष्ठ ( कलम का अभिमन्यु )

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