#Kavita by Sandeep Vashishth

यारों समझो देर नही है पुनः गुलामी आने में

 

जब  खुद  रोटी  देने वाला रोटी को मोहताज हो,

दर-दर ठोकर खाती यारों भारत माँ की लाज हो ।

बच्चे तक भी बिलख रहे हों सडकों पर भूखे नंगे,

धर्म बताकर यहाँ सियासी करवा देते हों दंगे।

हर कुर्सी जब प्यास बुझाने जाती हों मयखाने में,

यारों  समझो  देर  नही है पुनः गुलामी आने में।।

 

जहाँ  कबीरा  के  भी  घर  में रोटी की हो लाचारी,

वाणी के जयचंद यहाँ जब कमा रहे हों धन भारी।

जब विद्वानों को भी युग में पड जाये बस विष पीना,

असुरों के हिस्से में अमृत देवों का मुश्किल जीना।

सरस्वती जब जुट जाये लक्ष्मीं के कदम दबाने में,

यारों  समझो  देर  नही  है  पुनः गुलामी आने में।।

 

तुष्टीकरण सियासत की जब परिभाषा बन बेठी हो,

खूनी डायन तक भी अपनी भारत माँ पर ऐंठी हो।

गीदड यहाँ सवारी करते मिलते हो जब सिंहो पर,

नित्य  गुलेलें  दागी जाती जब निर्दोष बिहंगों पर।

बगुले  सारे  मछली  खाकर जुटते शोक मनाने में,

यारो  समझो  देर  नहीं  है  पुनः  गुलामी आने में।।

 

जब बासंती चोले वाले भूल भगत सिंह को जायें,

मातृभूमि की रक्षा खातिर हाथ नहीं जब उठ पायें,

जब वीरों की धरती पर ना पीने को पानी हो,

कितने ही बच्चों को यारों आती नहीं जवानी हो,

जब दुश्मन का झंडा ले गद्दार जुटें फहराने में,

यारों  समझो  देर नही है पुनः गुलामी आने में।

 

जब सरकारें भूखों को सपने सुखद दिखाती हों,

काले धन या काश्मीर पर न्याय नहीं कर पाती हों।

गरीब यहाँ जब पेट भींचकर बस भूखे सो जाते हों,

नेता  जी  के  नाती पोते  छप्पन भोग उडाते हों।

रोज सियासी लगे हुए हों जनता को बहकाने में,

यारों  समझो  देर  नही है पुनः गुलामी आने में।।

 

जब  काशी  के  बाजारों  में  अबला  बेची जाती हों,

अब तक यहाँ दुशासन द्वारा साडी खींची जाती हों।

जब भारत के न्यायालय भी न्याय नही कर पाते हों,

काश्मीर  में  सिर्फ   जिहादी  तेवर  देखे  जाते हों,

सभी मंत्री डरे हुए हो गोली तक चलवाने में,

यारो  समझो  देर  नही  है  पुनः  गुलामी  आने में।

 

बनी  लीक  पर  चलना ही जब सबकी मजबूरी हो,

कथनी  करनी की  भारत से मिट ना पाती दूरी हो,

चरण वंदना उनकी करना जब सबकी हो लाचारी,

पग-पग पर लालच की खातिर पुजते हों  व्यभिचारी।

ब्रह्मचारी  भी  आ  जायें जब योवन के बहकाने में,

यारो  समझो  देर  नही  है  पुनः  गुलामी  आने में

 

जब मंचों  के  पीछे  जाकर  के  अय्याशी होती हो,

माँ  वाणी  जब आसूं भरकर फूट फूटकर रोती हो।

आजाद,भगत सिंह गाने वाले अपना मोल बताते हों,

जब  लालच  के ताले  सबके होठों पर लग जाते हों।

कलमकार भयभीत मिले जब सच्ची कलम चलाने में,

यारो  समझो  देर  नही  है  पुनः  गुलामी  आने  में।

 

जब  गद्दारों  को  नेता  जी  कहकर  के  बोला  जाये,

और  गरीबों  के  पैसों  से  जब  उनको  तोला  जाये।

शैतान  यहाँ  जब जमें हुएं हों बस कुर्सी हथियाने को,

सदा  यहाँ  आतुर  दिखते  हो खुलकर छुरी चलाने को।

नैतिकता और राष्ट्र का रिश्ता रहता नहीं जमाने में,

यारो  समझो  देर  नहीं   है  पुनः  गुलामी   आने  में।

 

संदीप वशिष्ठ

 

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