#Kavita by Sandeep Vashishtha

घायल सैनिकों के उपचार के लिए हमने रक्त दान शिविर लगाया,

अफसोस कोई भी अफसर,नेता,अभिनेता रक्त दान के लिए नही आया।

इतने में आई रिक्से वालों की टोली,

हमारे सम्मुख आकर पूरी टोली एक ही सुर में बोली।

साहब हमारे शरीर का चाहे सारा खून निकाल लो,

और जितनी जल्दी हो सके घायल सैनिक भाईयों के शरीर में डाल दो।

जैसे ही हमने कुछ रिक्से वालों के शरीर में सुईं गढाई,

अफसोस सुईं किसी से भी एक बूंद खून नहीं निकाल पाई।

इसे देख कर मैं घबराया,

उन सब में सबसे बुजुर्ग रिक्से वाले को पास बुलाया।

देखिये मानता हूँ आप सभी में देश की सेवा के लिए पूरा जुनून है,

लेकिन आप किसी में तो देखिये एक बूंद भी नहीं खून है।

मुझे लगता है आपके शरीर को खून बनने के लिए जरा भी नहीं शुकून नही मिलता है,

इतना सुनते ही बुजुर्ग रिक्सा वाला बोला साहब रिक्सा डीजल या पेट्रोल से नहीं हमारे खून से ही चलता है।।

 

संदीप वशिष्ठ

 

 

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