#Kavita by Sandeep Vashishtha

हे  दिनकर  तुम कब  आओगे  अपने गीत सुनाने को ,

नागफाँस  में लिपटी  कविता  इसको  मुक्त करने को !

 

शायद अब यह समय नहीं है तुमको यहाँ बुलाने का ,

तुम्हे  बुलाकर  मंचों पर  यह नंगा  नांच  दिखाने का !

 

कच्चे  धागे  होते  सदृढ़  कैसी  सी  भी  जंजीरों  से ,

शासक  तक  भी  हुए  पराजित  देखे गए फकीरों से !

 

आज  नही  दिनमान  चमकता   अंतहीन   ये  रात  है ,

सूरज  से भी आज  अधिक  जब जुगनू की औकात है !

 

जो  मानव  की पीड़ा  सहकर  कविता  कहता आया है ,

दसों दिशाओं  ने   उसको   बस  भूखा  नंगा  पाया  है !

 

जाने  कब मौसम बदलेगा  कब तक  यूं  चलना  होगा ?

सच्ची  कविता  की   खातिर  हमको  यूं  जलना  होगा !

 

दिनकर   बोले  कलमकार   सुन  देर  भले  अंधेर  नहीं ,

भोर  यहाँ  आने   वाली है  समझो   अब  है  देर  नहीं !

 

फिर  गीतों  का  युग आएगा  झूमेगा  मद  मस्त  गगन ,

कविता   की   गंगा   उतरेगी   झूमेगा   हर  ओर  पवन !

 

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