Kavita Sangrh , for Mother”s Day

Happy Mother”s Day पर  साहित्यकारों से प्राप्त रचनाओं का संग्रह : –

 

Brijendra Singh Saral

 

माँ

 

जिसकी एक छुअन से मेरा, रोम रोम हर्षाता है ।

मेरे हर शुभ अशुभ कार्य की, वह ही भाग्य विधाता है।।

उसको हम क्या दे पायेंगे, जिसने दे दीं हैं साँसें ।

सब सुख दे वह दुख अपनाती, ऐसी मेरी माता है।।

 

कण्टक मिलते जब राहों में, वह पलकों से चुन लेती ।

अपनी संतति के हर सुख का, सपना मन में बुन लेती ।।

यौवन जीवन तन मन धन भी, हँसकर न्यौछावर करती ।

ईश्वर से माँगा सुख अपना, सुत की झोली भर देती ।।  – बिजेन्द्र सिंह सरल

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Kavi Kailash Soni Sarthak

 

माँ  –

 

माता तेरी महिमा के गुण गाऊँगा

तेरी सेवा कर जीवन महकाऊँगा

 

धन्य हुआ ये जीवन तुझसे पाया है

सारे जग में बस तेरी ही माया है

तूने माता इतना मुझको प्यार दिया

रंग बिरंगा मुझको ये संसार दिया

 

तेरे कदमों में ये शीश नवाऊँगा..

माता तेरी महिमा के गुण गाऊँगा

 

ममता तेरी मेरे लिए सौगात बड़ी

टल जाती है आई मुझपे घात बड़ी

हर पल तूने मुझपे प्यार लुटाया है

खुद भूखी रह मुझको सदा खिलाया है

 

सुबह शाम में तेरे चरण दबाऊँगा..

माता तेरी महिमा के गुण गाऊँगा

कैलाश सोनी सार्थक

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Vivek Bhaskar

 

हर मुश्किल की घड़ी में आशा है माँ

किस्मत की बिसात में कोई पांसा है माँ।

कड़कती ठिठुरन में गुनगुनी धूप है माँ

दिल की सूखी जमी पर बरसा रूप है माँ।

दर्द से भरी चोट पर मीठा मलहम है माँ

गमो की दीवारों में आत्म सबल है माँ।

उदासी से चेहरे पर बच्चे सी मुस्कान है माँ

गीता कुरान की कसम सी कोई इमान है माँ।

सफलता की मंज़िलो में आसान राह है माँ

हर दर से ठुकरे की आखरी पनाह है माँ।

रूखी सुखी रोटी में बेशुमार स्वाद हैं माँ

बचपन के पौधे की उन्नत खाद है माँ।

दिल की धड़कती सांसों की साज है माँ

गूंगी सी कोई ज़ुबा की आवाज है माँ।

खारे से समंदर में मीठा पानी है माँ।

दिल जिद्दीपन में कोई मनमानी है माँ

प्राण न्यौछावर जिस पर ममता रूपी है माँ।

बखान ईश्वर भी करे ऐसी ही खूबी है माँ।  🙏🙏🙏  विवेक भास्कर

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Tejveer Singh Tej

मातृ वंदना 🙏

माँ ममता-मय मंत्र मोहिनी,मधुरिम मंगल मनका है।

सुख-समृद्धि शक्ति सरूपा,सुंदर सुलभ सुजनका है।

भरण भाव भारी भर-भरके,भव्य भवन भरवाती है।

जब-जब जीवन जागा जगमें, जननी जग- जगजनका है।

 

माँ केवल एक शब्द नहीं है,अपितु स्वयं जग-रूपा है।

माँ सृजक है माँ पोषक है,माँ ममता की कूपा है।

प्रकृति अवतरित हो आती है,वेश लिये जब नारी का।

दुर्गा काली चामुंडा-सी,माँ ही शक्ति-सरुपा है।

 

धरणी पर आधार सृष्टि का,केवल माता होती है।

तन-मन-धन जीवन है माता,माँ नैनों की जोती है।

कोटि-कोटि वंदन है माँ के,परम अलौकिक रूपों को।

शक्ति-पुंज माँ जग कल्याणी ,जीवन-माल पिरोती है।

 

पावन परम् पुनीत प्रणेता,परमेश्वर-प्रति पोषी-सी।

सुरभित सरस-सरल सरिता-सी,सकल सुखद सन्तोषी-सी।

तेरा तेज तमस तल तारे,तपित-तृष्ण तनु-तन्द्रा-से।

अद्भुत अनुपम अवतारी अरु,औगुन अपि अवशोषी-सी।

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Pinku Rajput

माँ को प्रणाम करते हुए।

 

तेरी याद मुझे सोने नही देती।

माँ घर पर मुझे रोने नही देती।

हर खतरे को भाप जाती है माँ

मुझे घर से अकेला निकलने नही देती।

बन्दीसो में नही हु बुरी नज़र माँ लगने नही देती।

सलामती की दुआ करती रहती है

माँ ज़माने से अकेला मुझे लड़ने नही देती।

पिंकू राजपूत

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Chetan Krishan Shastri

माँ

 

माँ ग्रँथ है काव्य है गाथा है।

जन-जीवन भाग्य-विधाता है।

माँ कल-कल बहती सरिता है।

माँ रामायण, भागवद गीता है।

माँ मंदिर और शिवाला है।

हँस कर पीती हाला है।

माँ गज़लों में ,रुबाई में।

माँ तुलसी की चौपाई में।

माँ सर्वसुख कल्याणी है।

माँ उपनिषद की वाणी है।

माँ वेदों की ऋचाएं-श्रुति है

माँ प्रभु प्रार्थना-स्तुति है।

माँ मंत्रों का उच्चारण है।

माँ कारण और निवारण है।

माँ क्षमा-धर्म की मूरत है।

माँ प्रभु की सच्ची सूरत है।

माँ तो अंतर्यामी है।

माँ सर्वगुणों की स्वामी है।

माँ करुणा ,दया का सागर है।

माँ कुदरत सत्य उज़ागर है।

माँ निर्गुण ब्रह्म साकार है।

माँ भावों का आकार है।

माँ शाश्वत सत्य सनातन है।

माँ चिर-चिरंतन अंतर्मन है।

माँ अमर अमिट अविनाशी है।

माँ खुद में काबा-काशी है।

माँ देवकी, यशोदा,सीता है।

माँ अहिल्या,द्रौपदी पुनीता है।

माँ साथी तुम ,सहारा भी।

माँ भवसागर का किनारा भी।

माँ बच्चों की इबारत है।

माँ उनकी आदत, इबादत है।

माँ सत्कर्मों का प्रतिफल है।

माँ पुण्यात्मा निश्छल है।

माँ सब धर्मों का सार है।

माँ संसार का आधार है।

माँ दिल से दिल की आस है।

माँ रब की सच्ची अरदास है।

माँ प्रभु का प्रसाद है।

माँ ईश्वर का आशीर्वाद है।

माँ जीवन में वरदान है।

माँ स्वयं ही भगवान है।🌿🌹

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Santosh Kumar Preet

दुनिया में हर शख्स से बढ़ कर प्यारी माँ।

मुझको तो लगती है सबसे न्यारी माँ ।।

 

छोटी छोटी सबकी खुशियों की खातिर,

हँसते हँसते ले लेती गम सारी माँ ।

 

आशीर्वाद सरीखा मुझको लगता है ,

कभी कभी जो दे देती हैं गारी माँ ।

 

चाहे हो प्रतिकूल परिस्थिति जैसी भी,

कभी न देखा मैंने हिम्मत हारी माँ ।

 

‘प्रीत’ पले ममता के तले तेरी आँचल में,

और। नही कुछ चाहत शेष हमारी माँ ।।

 

संतोष कुमार ‘प्रीत’

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Rajesh Kamal

मां

——

एक कुतिया सुबह-सुबह

दरवाजे पर आई

बड़ी भूखी लग रही थी

रात की बची बासी रोटियां

मैंने चबूतरे पर डाल दी

उसने जल्दी से एक खाई

बाकी दो मुंह में दबाई

और फिर उधर दौड़ लगाई

जिधर कर रहे थे इंतजार

उसके नन्हे-नन्हे पिल्ले

जबकि हम इंसानों की तरह

उसे यह उम्मीद भी नहीं थी

कि बड़े हो कर वे पिल्ले

इस तरह उसे भी

ला कर दिया करेंगे रोटियां… राजेश ‘कमाल’ मो.-9785508951

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Gorav Tripathi

 

तेरी सूरत से बढ़के भगवान की सूरत क्या होगी,

तेरी ममता से बढ़के दुनिया की ममता क्या होगी,

ब्रह्मा की पावन कृति हो तुम,  मां अमर नेह की धारा हो,

बढ़कर इस पावन रिश्ते से वो जन्नत भी क्या होगी..

*

तुमने इतना उपकार किया, मुझको दुनियां मे लाया है..

मां अमर प्रेम देकर तुमने, जीवन खुशहाल बनाया है,

इस धन्य धरा का कण कण मां, स्नेह से तेरे फला हुआ..

इस अमर प्रेम से बढ़कर अब, संसार की दौलत क्या होगी,

तेरी सूरत से बढ़कर भी……

*

मां याद हैं वो बचपन के दिन, जब खेलकूद कर आता था,

दुनियां की नजरों से बचकर, तेरे आंचल में छिप जाता था,

जब धूल में सनकर आता था, मां तुम मुझको अपनाती थी,

राजदुलारा कहकर मां तुम मुझको गले लगाती थी,

इस दिव्य हृदय की ममता से बढ़कर, मेरी भी चाहत क्या होगी,

तेरी सूरत से बढ़कर भी…..

*

खुद दलदल में सोकर भी तुमने, सूखे में मुझे सुलाया है,

खुद भूखी रहकर भी, मां तुमने मुझे खिलाया है

मां जब जब मेरी आंखों से, इक बूंद भी आंसू आएं है,

तुमने इक आंसू के बदले मां, अपना रक्त बहाया है,

जीवन में अब बढ़कर इससे, कोई मन्नत अब क्या होगी,

तेरी सूरत से बढ़कर भी…  – गौरव_त्रिपाठी

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Vinita Rahurikar

माँ

 

दुनिया प्रगति पथ पर

जब आगे भागती जाती है,

तब भी वह थम कर

डगमगाते कदमों को

चलना सिखलाती है।।

नारी मुक्ति और

स्वतंत्रता आंदोलनों के बीच वह

अपने गले के चारों और

बड़े आग्रह से स्वीकारती है बंधन

दो सुकुमार बाँहों का।।

रात जब स्वप्न रचती है

अपना आराम छोड़कर

वह पंखा झलती है

बच्चे की नींद के लिए।

कभी वह धूप में तपती है,

कभी ठण्ड में ठिठुरती है।।

उसे नहीं पता

दुनियां चाँद पर जा पहुँची है,

वह तो जानती है बस

अपने आँचल के तारे को।

सागरों की गहराई से

उसे क्या लेना देना,

वे छू भी नहीं सकते

माँ के प्यार की गहराई को।।

दुनियां जब लड़ती है

अपने अधिकारों के लिए,

वह चूल्हे में लकड़ियाँ सुलगाकर

परोसती है भूखे बच्चे की थाली में

गरम-गरम रोटी।।

लोग लड़ते है जब

जमीन के टुकड़ों के लिए

वह खुद अधर में टंगकर भी

तैयार करती है

दो कदमो के लिए खड़े रहने लायक जमीन।।

सारी दुश्चिंताओं को सीने में छुपाकर

दोनों हाथो से

सहेजती है बच्चे की खुशियाँ उम्र भर।।

दुनिया के हर घर में अगर

ऐसी एक माँ है

तो बताओ फिर

दुःख के लिए

जगह ही कहाँ रह जाती है।।  –  डॉ विनीता राहुरीकर

Santosh Raj

मेरी प्यारी माँ…!!

 

कैसे बताऊ माँ, कितना सुकून है तेरे आँचल में,

 

आज भी जब सर रखता हूँ, तो वही सुकून है तेरी गोद में,

 

ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया,

दिन हो या रात हो अपनी बाहों में झुलाया,

 

क्या अच्छा है क्या बुरा है ये समझाया,

मेरे हर दर्द हर आंसू को अपनी आँखों में बसाया,

 

जिंदगी का वो हर दिन, वो हर पल दिया है,

भुला खुद को तूने, रात दिन एक किया है,

 

कैसे बताऊ माँ, कितना सुकून है तेरे आँचल में।।

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Akash Khangar

 

माँ

**

मैंने घूमा माँ सारा जहां

हर रिश्ता और आशियाँ

कोई नही है तुमसा प्यारा माँ…

 

सबने देखी कमियां मुझमे

खूबी देखी तुमने माँ

मुझे नही पता रब कैसा है

तेरी सूरत रब के जैसी माँ…

 

मैं सोया तो माँ सोयी

मैं जागा तो जागी माँ

कितना अनोखा कितना प्यारा

तुम्हारा मेरा नाता माँ….

 

मन तुम्हारा इतना निर्मल

जैसे गंगाजल पानी माँ

मेरे जीवन को आकार दिया

तेरे चरण मेरी राजधानी माँ…आकाश खंगार

Nirdolsh Kumar Pathak

 

मां मेरी मां

 

य शीत त्रतु की खिलती धूप सी

मीठे जल की गहरी कूप सी

ओ रिमझिम बूंदे सावन सी

व प्रेम की मूरत पावन सी

ग्रीष्म त्रतु की पुरुवाई सी

मुझको लेकर घबराई सी

सांझे की है वंदन जैसी

माथे की है चंदन जैसी

आंचल में छिपाती जो

पलकों में बिठाती जो

मां मेरी मां               –  निर्दोष कुमार पाठक

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Krishan Kant Dubey

माँ!

तुम्हारे आँचल के तले ममता का अपार सागर

उमड़ता-घुमड़ता है

और

मैं उसी सागर में किलकारी मार-मार कर

खूब उच्छलता हूँ/कूदता हूँ.

 

माँ!

तुम्हारी हथेलियों की थपकी पाकर

खूब बनता/सवंरता हूँ

और

उन्हीं हथेलियों के स्पर्श को पाकर

हर दिन पाता हूँ

नया-नया आकार/और

उन्हीं आकारों में भरता हूँ

तुम्हारी संस्कृति के रंग.

 

माँ!

तुम्हारी आँखों में वात्सल्य की अपार लहरों को

जब देखता हूँ

जीवन का पल/प्रतिपल खुद-ब-खुद

किलकारियां भरने लगता है,

माँ! तुम्हारी हर प्रेरणा

जीवन को देती हैं

एक नई दिशा/और

उन दिशाओं के पथ पर चलकर पाता हूँ

मंजिलों की चमकती दुनिया.

 

माँ!

तुम्हीं हो मेरी देवता

और

तुम्ही हो मेरे जीवन की गति-दिशा,

माँ!

तुम्हारे हर रुप को नमन

तुम्हारी हर शक्ति को नमन.   –   कवि कृष्ण कान्त दुबे

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Meharu Pandit Pyasa

 

गीतिका छंद

 

कर्ज़ माँ के इस जहां में हम गिना सकते नहीं।

मोल ममता का कभी भी हम चुका सकते नहीं।

पूज्य है निज जिंदगी के भाग करती है सदा।

तन समर्पित मन समर्पित त्याग करती है सदा।

 

माँ कहो, भगवान कहलो एक ही तो बात है।

माँ उजाला आँख का दुनियाँ अँधेरी रात है।

रूप माँ ने जो धरा भगवान का ही रूप है।

छाँव केवल मात दुनियाँ चिलचिलाती धूप है।

 

माँ दुआओं में सदा सुख माँगती संतान का।

दिल कभी भी मत दुखाना भूलकर भगवान का।

कब उतरते हैं यहाँ अहसान बोलो नाप के।

कष्ट हरती आ रही माँ उम्र भर है आपके।

 

हम सुलाये साफ़ में माँ मूत में सोती रही।

जब हुऐ बीमार तो वो रात भर रोती रही।

रोज़ सेवा में रहें करना अगर भव पार है।

मात की सेवा जगत में मुक्ति का आधार है।  – मेहरू पण्डित प्यासा

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Naveen Kumar Jain

माँ

 

माँ का हृदय रत्नाकर सा,

माँ तारापथ समान है ।

माँ की जान बसे बच्चों में,

माँ बच्चों की जान है ।।

माँ  खुशियाँ संग मनाती है ।

माँ मिश्री सी, लोरी सुनाती है ।।

माँ गलती पर बच्चों को  डाँटती है ।

माँ अपना दुःख न बाँटती है ।।

माँ की ममता सिंधु सी विशाल है,

माँ बच्चों की रक्षक, भाल है ।

बच्चों पर जो छाए संकट,

माँ कालिका बन जाती है ।

जैसे निज शिशु की रक्षा हेतु,

हिरनी; सिंह से लड़ जाती है ।। – नवीन कुमार जैन

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