#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati

कोई मन्दिर,कोई मस्जिद के लिये लड रहा है,

जात-धर्म के नाम पर देश अपना उजड रहा है।

 

फुल बाटते हाथो मे हथियार थमा दिया है लोगो ने

दिल जैसी जमीन पर नफरते ऊगा दिया है लोगो ने।

साथ-साथ चलते लोग अब दुरियां बनाये बैठे है

हिन्दु-मुस्लिम थे कभी ऐसे,जैसे एक मां के बेटे है

चंद देश के गद्दारो ने आग लगा दी है रिस्तो मे,

भाई ही अब भाई का लहु बहाने आगे बड रहा है।।

कोई मंदीर,कोई मस्जिद के लिये लड रहा है

जात-धर्म के नाम पर देश अपना उजड रहा है।।

 

फैले अशांति जिससे,ऐसे ही वो मुद्दे चलाते है

मूलभूल समस्याओ से वो जनता को भटकाते है

लाखो पढ़े लिखे दरबदर की ठोकरे खा रहे है

तो कोई,कोसो दूर से मरीज अस्पताल ला रहे है

कोई त्रिपाल तानकर बसर कर रहा है जिंदगानी

तो कोई प्यास से तडफ रहा,कोई बहा रहा है पानी

कोई कांधे पर ऊठा शव मीलो दूर चला जाता है

तो कहीं इंसान को धुत्कार कर कुत्ता पाला जाता है।

घर-घर राजनिति आ गई,घर-घर विपछ हो गया है,

झुठ-फरेब के दौर मे इंसान,इंसान से ही बिछड रहा है।

कोई मंदीर कोई मस्जिद के लिये लड रहा है

जात-धर्म के नाम पर देश अपना उजड रहा है।।

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