#Kavita by Sanjay Shukla

तब समझो आई है होली।।

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लाल हरा नीला व् पीला।।

मन उल्लासित तन हो गीला।।

तन मन में जब मस्ती छाये ।।

मन काबू में ना रह जाए।।

हर मन में जब उठे उमंग।।

झूम रहे हो सब मिल संग।।

गूँज रहे हो ढोल मृदंग।।

नाच रहे एक दूजे संग ।।

हर चेहरा हो जब लाल।।

चेहरे पर हो लगा गुलाल।।

सर पर चढ़ी हुई हो भंग।।

हाथो में हो सबके रंग।।

गांव शहर में घूमे टोली।।

तब समझो आई है होली।।

2

बागो में जब कोयल बोले।।

कानो में वो मिश्री घोले।।

अमवा की डारी बौराये।।

पपीहा भी शोर मचाये।।

टेसू से सब जंगल लाल।।

सुन्दर प्रकर्ति करे कमाल।।।।

फसले लहर लहर लहराये।।

सरसो कटकर घर को आये।।

हलधर भी जब ख़ुशी मनाये।।

मनवा झूम झूम कर गाये।।

घर बाहर जब सजे रंगोली।।

तब समझो आई है होली।।

3

देवर भाभी करे ठिठोली।।

भाभी देवर से यूं बोली।।

रंग दूँगी तुमको मै देवर।।

देखूँगी अबके मै तेवर।।

जीजा के चक्कर में साली।।

देख रही है बस घरवाली।।

अनजाने भी हुए हमारे।।

रिश्ते बदल गए है सारे।।

दरवाजे पर खड़ी हो टोली।।

तब समझो आई है होली ।।

 

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