#Kavita by Sanjeev Kumar

वो अपने लिए नहीं जीती

हर खुसी को छोड़ कर

दुख है समेटती

सारी खुशियाँ न्यौछावर करके

आंचल में मुँह करके रोती

समाज के कुछ नामर्दों ने

इनके पर है काटे

हाथ उठाकर नारी पर

दम अपना आजमाते

जब नारी की हया लगी

सत्यानाश हो जायेगा

पंख दे दो इनके उड़ानों को

हटा दो सारी बंदिशें

 

 

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