#Kavita by Sanjeev Tyagi

हमारी न्यायपालिका

 

जीवन मरण का प्रश्न जुड़ा जहाँ, होती ना रखवाली है।

जिसको कहते न्याय का मंदिर, क्या होती वहां दलाली है।

 

न्यायपालिका की सच्ची, तुमने तस्वीर दिखा दी है,

राजनीति से प्रेरित हो, तुमने ये बात सिखा दी है।

 

पहले होते घोटालों पर, नीरो बनकर रहते थे,

सिसक रही थी जनता बेबस, जीरो बनकर रहते थे।

 

फिर कैसे हनुमान सरीखी, शक्ति का पता लगा बैठे,

अल्प काल में ही अपने, तुम स्वाभिमान जगा बैठे।

 

न्याय के मंदिर में बैठे तुम, रब का दूजा रूप लगे,

अन्धा हो कानून भले ही, पर तुमसे ही आस जगे।

 

अपराधी को सजा दिला दो, निर्दोषों पे आंच न आये,

पहलू में हो न्याय तुम्हारे, छूट कहीं वो सांच न जाये।

 

नेताओं में और प्रशासन, मची हुई है लूट जहाँ,

मन में है विश्वास अभी, न्याय हुआ मजबूत यहाँ।

 

फिर ऐसी थी क्या मजबूरी, तुमने रूप दिखाया था,

बंटवारे के इस धंधे में, क्या खोया क्या पाया था।

 

खूब सुना है हिस्से का, बंटवारा होता श्वानों में,

आहें भी बैसाखी पर हैं, जब हिस्सा हो विद्वानों में।

 

राजनीति गर करनी हो तो, बहुत खुला मैदान है,

स्वागत करता है संजीव, अब हाथ जोड़ श्रीमान है।

 

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