#Kavita by Sanjeev Tyagi

राष्ट्रवाद

 

राष्ट्रवाद की क्या परिभाषा, तुमको आज बताता हूँ।

जो जयचन्दों ने पहना चश्मा, उसको आज हटाता हूँ।

 

दिल में जिनके राष्ट्रप्रेम ना खंडन वो सह सकते हैं,

बेटा हो बलिदान राष्ट्र पर ऐसा वो कह सकते हैं।

देख तिरंगे की आभा को मस्तक पर स्वाभिमान जले,

मिट्टी की उठती खुशबू से आंखों में अरमान पले।

देख शहीदों की बरसी पर आता खून का दौर है,

शांत पहर सा दिखता लोहू लावा सा उठता शोर है।

सूरज की उगती किरणों को नाम वतन के करता है,

मेरा प्यारा देश हो ऐसा पल पल आहें भरता है।

जड़ें बहुत गहरी हैं फैली इन उपजाऊ जमीनों में,

राष्ट्रवाद है पीपल बरगद है मजबूत जमीनों में।

 

हिन्दुस्तान अमर है अपना ये नारा आज लगाता हूँ।

राष्ट्रवाद की क्या परिभाषा……………

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आज उठा जो तूफानों का दौर भी अब थम जायेगा,

गद्दारों की आहों का पानी भी अब जम जायेगा।

नापाक इरादों की खातिर जो बिकते रहे बाजारों में,

हाथों में है विष की थैली औ बांट रहे चौबारों में।

खुली हवा में सांस है लेते क्या जाने उस पीड़ा को,

व्यसन और अय्याशी वाले क्या जाने उस पीड़ा को।

इक जुनून है पागलपन है या है फिर गहरी साजिश,

अपने घर में ही आजादी, क्यों है फिर उठती आतिश।

इन्हें सहारा देने वाली बेल लता क्यूँ फैल रही,

काटो इनके वृक्ष तने से, जड़ों से दुर्गंध फैल रही।

 

धूल हटाकर दर्पण से तुम्हें चेहरा आज दिखाता हूँ।

राष्ट्रवाद की क्या परिभाषा…………..

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अंगारे सुलगे हैं कैसे, हाल देश का बता रहा,

कुर्सी पाने की चाहत में, छद्म युद्ध अब सता रहा।

भीतरघात करे जो जाफर, अंकुश अब करना होगा,

सड़कों पर ही बने समाधि, इनको अब तरना होगा।

जय जयकार नहीं हो सकती, इन जहरीले सांपों की,

पाखंडी सब भूल गये क्या, गिनती अपने पापों की।

हिन्दुत्व उदार है सब जानें पर, तुमने ठोकर मारी थी,

भगवा आतंकवाद कहाया, तन पर चलती आरी थी।

नीच पशुता की हद से भी, नीचे तुम गिर जाओगे,

गौ माता को खुली हवा में, नोंच नोंच फिर खाओगे।

 

अन्धवाद में अन्धे हो तुम, मैं कविवर तुम्हें जगाता हूँ।

राष्ट्रवाद की क्या परिभाषा………….

 

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