#Kavita by Santosh Nema Santosh

साल अठारह अब चला,आया सन उन्नीस
जाते जाते दे गया,बहुतों के मन टीस

ऋण माफी के दौर में,खूब हुईं हड़ताल
वादे चुनावों में किए, ठोंक ठोंक कर ताल

परिणामों ने पलट दिए,सत्ता शासक लोग
जन जन की कीमत बढ़ी, आया ऐसा योग

मन के लड्डू खाइके,दिया दिलासा खूब
पर खुद इनका अहम ही,इन्हें ले गया डूब

सहमा सा उन्नीस है,देख अठारह हाल
फिर चुनाव है सामने,लगे बिछाने जाल

जाति धर्म के नाम पर,फिर होगी तकरार
सामाजिक सौहार्द का,करते बंटाधार

खूब प्रलोभन दे रहे,करके कर्जा माफ
हर दल चाहे बढ़ सके,उनका भी अब ग्राफ

देकर चीजें मुफ्त में,लगा रहे नव रोग
चुप्पी क्यों आयोग की,कहते सारे लोग

नियमों की अवहेलना,आम हो गई आज
सत्ता प्रेमी बिगाड़ते,अच्छा भला समाज

जन जन में भी हो सदा,चेतना का संचार
होगी जीवन मे तभी,खुशियों की बौछार

नव उमंग नई तरंग से,है मन में उत्साह
नव वर्ष में खुशियों की,होती सबको चाह

कीमत मत की जान कर,काबिल को दें वोट
चाबी सत्ता की यही,करता है यह चोट

खुशियां आयें झूम कर,मन में हो “संतोष”
नव वर्ष पर हर दिल में,हर क्षण हो नव जोश
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@संतोष नेमा “संतोष”

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