#Kavita By Sapna Pareek

अश्रु और मैं ——-
मैं और अश्रु
इसके अलावा
ना था कोई और
हम दोनों थे
एकांत था
बहुत खुश थे
स्पर्श का अहसास था
गुफ्तगू की हमनें
कहा हमने उनसे
क्यों चले आते हो हरदम
क्या करूँ ?
तुम्हें महसूस करते है
लगता है जब तुम अकेले हो
हम दौड़े चले आते है
हमें तुम्हारी आदत सी हो गई
हमारे आने के बाद
हल्केपन का अहसास होता है
दिल का भार अश्रु संग बहाते है
इसलिए हम चले आते है।
अश्रुओं की व्यथा…
है ना स्वप्न…!
—– मुस्कुराहट——-
हवाएं गुनगुना रही
मधुर ध्वनि आ रही
कहना क्या चाह रही
खुशी की बू आ रही
संदेशा कुछ ला रही
संग किसी के आ रही
बहुत मुस्कान ला रही
एक राग अलाप रही
इतना क्यों मुस्कुरा रही
प्रतिध्वनि सी आ रही
बात कुछ तो हुई होगी
इतनी क्यों अकुला रही
खोलना अब चाह रही
दिल की रंगीन परत को
‘स्वप्न’ कहना चाह रही
बतलाने मुझे आ रही
खुशी के लम्हें आ गए
कुछ तो गुनगुना रही
खुशी की बात आ गई।
है ना स्वप्न…!
– सपना पारीक ‘स्वप्न’
   ( विजयनगर, अजमेर )

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