#Kavita by Sathi Mukherji

त्रिकोण प्यार ,बदली नजंर

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थी मेरी सहेली हमंराज वो

बदली नज़र ,मैं करती क्या।

त्रिकौण मोहब्बत हमारी

नाकाम दिल से, मैं करती क्या।।

तुम भी तो हुए बेबफा

एकतरफा  ,मैं करती क्या

अब मेरा रक़ीब ,तेरा प्यार वो

मैं बेचारी करती क्या।।

ये दुनियां है आनी-जानी

फैला स्वार्थ मै करती क्या

तेरी तासिर बदल गई जब

बटवांरा तेरा ,करती क्या।।

टुट़ गए हैं बधंन सारे

छूट़ गए सब रिश्ते

ज़बरदस्ती ,बांध के तुमको

वदिंश तुमपे ,करती क्या।।

वो चाँद तुम आकास

मैं ठ़हरी रात अधेंरी

हम दौनो के ,राह अलग अब

मैं कौशिस ,फिर करती क्या।।

तुम दरिया मैं तपती रेत

मैं सेहरा को ,समुंन्द्र करती क्या

तेरी खुशी थी चाहत मेरी

मैं ईससे आगे करती क्या।।

प्यासे मन के ,मरु भूंमि पे

छिंटे अश्को के ,मैं करती क्या

कर दिया तुमको ,अर्पन सब

दिल दर्पन टुटा ,समेटती क्या।।

बदली नजंर ,मैं करती क्या।।

साथी मुर्ख्जी ( टीना )

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