#Kavita by Saurabh Dubey Sahil

~ पेड़ की व्यथा ~

 

मुझको अब और अधिक ना काटों तुम ,

स्वार्थों के लालच में ना बाँटों तुम ।

 

में ही जलती तपती दोपहर में ,

मलय पवन का झोंखा हूँ ।

 

में ही सूरज के तपते शोलों को ,

तुम्हारे ऊपर से रोका हूँ  ।

 

में ही उमस भरी रातों का ,

उगता नया सबेरा हूँ ।

 

में ही घर आँगन में चहकती चिड़ियों का ,

एक मात्र वसेरा हूँ ।

 

में ही तुम्हारे सूखे बंजर खेतों में ,

काले बदरों से बरसात कराऊँगा ।

 

में ही धरती पर खिले फूलों के सँग ,

मनमोहक पवन वहाऊँगा ।

 

में ही जाने अन्जाने इस जीवन में ,

जाने कितनी ही खुसियाँ लाऊँगा ।

 

~  सौरभ दुबे  ” साहिल ”

किशनी मैनपुरी ( उ प्र )

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