#Kavita by Saurabh Dubey Sahil

गर जो आप गुलाब होते

 

मदमस्त भोंरे हम भी होते,

गर जो आप गुलाब होते ।

 

मेरे लिए हर दिन इतवार होते,

गर जो आप हमारे पास होते ।

 

रोज सुबह घण्टों निहारते तुम्हे,

गर जो आप अखबार होते ।

 

हम तो अनपढ़ ही रह जाते,

गर जो आप किताब होते ।

 

उलझने कभी सुलझती ही ना,

गर जो आप हिसाब होते ।

 

सोचो जुबां पर कितने सबाल होते,

गर जो आप जबाब होते ।

 

हम तो हमेसा बीमार ही रहते,

गर जो आप इलाज होते ।

 

हम तो रात दिन नशे में ही रहते ,

गर जो आपकी आँखों में जाम होते।

 

दरिया क्या समन्दर भी सूख जाते,

गर जो आप उदास होते ।

 

हम दिन क्या रात में भी ना सोते,

गर जो आँखों में हमारे ख्वाब होते ।

 

~ सौरभ दुबे  ” साहिल ”

किशनी मैनपुरी (यूपी )

8923767740

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