#Kavita by Shabnam Sharma

तुम सब कुछ हो

घर की बोलती दिवार,

वर्षा की पहली फुहार,

नन्हें का दुलार,

पति का अनकहा प्यार,

सिर्फ तुम ही हो

बस सब कुछ तुम ही हो।

थाली में रखा वो प्यार,

बच्चों की आवाज़

बड़ों का अधिकार,

समाज का आधार,

बस सब कुछ तुम ही हो।

पायल की छन-छन,

मन्दिर की टन-टन,

खिलौनों की खनक,

हर चेहरे की चमक,

बस सब कुछ तुम ही हो।

शक्ति की तलवार,

हर रावण का वार,

कंस का प्रतिहार,

इस धरती का शिंगार

बस सब कुछ तुम ही हो।

तुम नहीं, तो वृक्ष पर पात नहीं,

सूखी नदियाँ, कोई बात नहीं,

सुनसान दुनिया, कोई रंग नहीं,

सब विरान, कुछ संग नहीं,

समझ नहीं आता, क्यूँ ज़रूरत हुई

ये सब बताने की, तेरे अस्तित्व

को जिन्दगी में लाने की, जबकि

पता है सबको तू जननी है, तू अग्नि है,

तू धरा है, तू सागर है, तू गागर है,

तू नही ंतो कुछ भी नहीं,

बस सब कुछ तुम ही हो, तुम ही हो।

& शबनम शर्मा] अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.                       मोब. ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

 

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