#Kavita by Shabnam Sharma

रिवाज़

सुबह उठ बुहारना आंगन,

झाड़ना पूरा घर,

नहा-धोकर

दीया बाती जला,

नित ताकना इक बार,

सभी दरवाजों की ओर

जो अभी नहीं, अपने

वक्त पर चाय की चुसकियों

के साथ खुलेंगे

व आयेगी आवाज़

‘‘माँ क्या है?

सुबह-सुबह ही छटर-पटर

करती हो, नींद नहीं आती’’

सुनकर, अनसुना कर

चल देती रसोई की ओर,

बनाती इन नाशुत्रों के

लिये नाश्ता,

कभी रोटी, कभी परांठा

और थका लेती खुद को

सभी पेट भर खाते

पर उठते हुए कभी

कहना न भूलते

‘‘माँ मोटे हो जाएँगे,

कुछ हल्का-फुल्का

बना दिया करो।’’

चुपचाप देखती, सोचती

उन दिनों को

जब हाथ में रोटी लिये

मक्खन की डली के

साथ, रोली-पोली बना

लड़-लड़कर, छीना झपटी

करते खाते थे ये बच्चे।

अभी बासन भी न मंजते

कि दोबारा भूख-भूख

करते थे ये बच्चे,

थमाती थी मक्कई, गेहूँ का भूजा

साथ में छाछ,

और चढ़ाती चुल्हे पर

दाल की हांडी, बीनती चावल

गूंथती आटा,

दोपहरी निपटते ही शाम

और फिर रात कब हो जाती

पता ही न चलता,

आज कंधे पर कंप्युटर

का बैग लिये निकलते

पूरा दिन कुर्सी पर बैठे

गड़ाये आँखें सामने,

अकड़ा लेते हाथ पाँव

बढ़ा लेते तोंद

व शिकायत करते

उसी माँ को

जिसके हाथ भी जले, सिके

रोटियों संग

‘‘कुछ हल्का-फुलका बना

लिया कर माँ।’’

सुन सब की, फिर भी दूध

से मलाई उतार

गिलास भर, थमाती सबको,

कहती, ‘‘पी लो, इसमें अब

मोटा होने का कुछ भी नहीं।’’

माँ है जानती सब

रिवाज़, सब ढंग व खिला ही

देती है अमृत जो आज नहीं

कल पता चलेंगे इनको।

शबनम शर्मा ] अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.

मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

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