#Kavita by Shabnam Sharma

पिता

कन्धे पर झोला लटकाए,

खाना व पानी लिये,

देख सकते

दौड़ते-भागते पकड़ते

लोकल ट्रेन, बसें।

लटते-लटकाते,

लोगों की दुतकार खाते,

कभी घंटे भर का तो कभी

घंटों का सफर करते।

ढूंढते पैनी नज़रों से,

कहीं मिल जायक हाथ भर

बैठने की जगह,

मिल गई तो वाह-वाह,

वरना खड़े-खड़े करते, पूर्ण वर्ष ये सफर।

पहुँच दफतर, निबटाते काम,

खाते ठंडा खाना, पीते गर्म पानी,

बचाते पाई-पाई।

लौटते अंधेरे मुँह घर,

कल फिर से आने की

आशा लिये।

अक्सर घर से जाते-आते,

सोए मिलते बच्चे,

थकी दिखती पत्नि।

ये कोई और नहीं,

पिता है, पिता है,

जिन्हें अपनी नहीं

परिवार की फ़िक्र है।

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