#Kavita by Shabnam Sharma

खूंटी

घर का गलियारा लांघते ही,

खूंटी पर टंगा, बाबूजी का कोट,

छतरी और मेज़ पर पड़ा चश्मा।

बरसों से टाँगते बाबूजी, इस

पर अपनी मौसमी पोशाकें,

कभी कुरता-पजामा, तो

कभी भारी सा कोट,

चुपचाप समेटे रहती ये खूंटी,

उनका सामान।

कभी खाली नहीं होती,

कभी बाहर के कपड़े, तो कभी घर के।

जी चाहता वो बतियाए

सामने वाली से कभी

जिस पर टंगे हैं चुन्नू के खिलौने

उसकी सोच, पगला सी गई,

ये कैसा शोर,

बबुआ उतार रहा, उस पर से

बाबूजी के कपड़े,

कोई नहीं सुन रहा उसकी आवाज़,

ले जा रहे बाबूजी को,

जो उसे अपना दोस्त समझते थे

रो रही खूंटी, पर नहीं पोंछ रहा

कोई उसके आँसू।

आवाज़ धीमे से आई, उस अन्दर

की कील से, जिसने थामा था उसे

बरसों अन्धेरी कोठरी में रहकर

दिवारों में बिन सांस लिये।

‘‘चुप हो जा मैं तेरे साथ हूँ जीवन भर,

याद कर दादा के समय जब उन्होंने

हमें इकट्ठा यहाँ बसाया था।

मैं सदैव तेरे संग हूँ।’’

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