#Kavita by Shabnam Sharma

परीक्षा

कोख में ही शुरू हो जाती परीक्षा,

जन्म लेने की, इस संसार

में बसने की,

कदम-कदम पर इम्तिहान,

कभी कागज़ों से,

कभी भावनाओं के

तो कभी मौसम के।

परिणाम नहीं आते इनके,

पर लगातार देते-देते इम्तिहान,

थक जाते हैं हम,

धोखे खाते हैं

फिर भी दोहराते हैं वही गलतियाँ,

मिलते हैं सबक

जो कभी किताबों में नहीं होते,

जिनके लिये परिभाषा और शब्द

नहीं होते?

देते हैं सबक, सिर्फ वो ही

जिन्हें हम अपना कहते हैं

विश्वास करते हैं।

सोचते हैं न जाने कौन सा

तमगा पहना देंगे।

चल देते हैं पूरी कर अपनी उम्र

वो समझते नहीं, हम समझाते नहीं,

सिर्फ इक अदृश्य परीक्षा के पात्र बने,

उठा दिये जाते हैं, ये कहकर

‘‘जल्दी करो, कब तक घर में रखेंगे?’’

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