#Kavita by Shailesh Kumar Singh Shail

बहुत बेहतरीन सी जिंदगी तेरी है पगले।

आज लाखों का कोई लेखा जोखा नही।

कोई भूख से तिलमिला रहा तो कोई प्यास से।

सबको जीने का मिला सही मौका नही।

शैल शर्मिंदगी होती है ये देखकर कि हम आज भी।

अपनी ही जरूरतों के ग़ुलाम है।

नफरतों की ग़ुलामी, ज़िल्लतों की ग़ुलामी, चंद पैसो की ग़ुलामी अभी जिंदा है।

मुस्कुराने की ग़ुलामी, दाने दाने की ग़ुलामी।

चंद लम्हो की ग़ुलामी अभी जिंदा है।।

किस बात की खुशी मना रहे हो दोस्तो।

पानी पानी की ग़ुलामी अभी ज़िंदा है।

बिक गई है धरा की कण कण जरूरतों में।

गरीबी की कहानी अभी ज़िंदा है।।

शैलेश सिंह शैल,,

 

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