#Kavita by Shanoo Bajpai

” बाल श्रम”

 

उम्र  थी  बस नौ बरस ।

आ रहा जिस पर तरस।

 

वक्त  के  हाथो छला था।

मुफलिसी मे वो पला था।

 

सर पर  जिम्मेदारिया थी।

जिन्दगी की दुश्वारिया थी।

 

जाने क्या मजबूरिया थी।

बचपने से क्यो दूरिया थी।

 

वो खूब पढ़ना चाहता था।

वो आगे बढ़ना चाहता था।

 

बहुत ही मासूम लगता था।

वो खुद  को  ही ठगता था।

 

बोली मे बहुत मिठास थी।

ईश्वर से उसको आस थी।

 

कम उम्र मे ही बड़ा हुआ।

अपने पैरो मे खड़ा हुआ।

 

हँसी ठिठोली वह भूल गया।

बच्चो की टोली वो भूल गया।

 

सर पर घर का भार लिये।

मँहगाई की वह मार लिये।

 

वह झाड़ू पोंछा  करता था।

स्वाभिमान  भी  मरता था।

 

दुनिया उसकी छोटी थी।

बस दो वक्त की रोटी थी।

 

गम के आँसू छाँट रहा था।

जीवन ऐसे काट रहा था।

 

देखो खाली पेट ही सोती है।

यह निर्धनता  ऐसी होती है।

 

मन मे  काफी अभिलाषा थी।

बस यह उसकी परिभाषा थी।

 

“शानू बाजपेई,अपूर्व”

 

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