#Kavita by Shashi Raghuvanshi

जीवन यात्रा +

 

अकड़ भी छोड़ गई

तेडी़ कर कर के कमर

ढोने तजुर्बे जिंदगी के.

 

देखें हैं जिंदगी के कितने ही

नाटक बेहतरीन इन आँखों ने

इस मोतियाबिन्द के मंच पर.

 

दर्पण को शर्माती

ये परत दर परत झुर्रियां

बनाया है इन्होंने पुस्तकालय

जीवन के सफर का.

 

भ्रमित ही रहा अहकारी चिंतन

चेतन की चेतना मे

अवचेतन कहां छोड़े पीछा

खामौश ही रहा अतसं

बिन प्रेम बिन प्यार.

 

जीवन समझ कब आया

विदा का समय जब आया.

 

जीवन यात्रा

Dr Shashi Raghuvanshi.

 

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