#Kavita by Shiv Kumar Dipak

दर्पण #

खूब दिखाये सपने तुमने ,
जनता को खुशहाली के ।
उम्मीदों की खातिर ढोये ,
मंजर सब बदहाली के ।।

सोच रखा था सबने मन में , खुशियां घर में आएंगीं ।
अच्छे दिन आने वाले हैं , विपदाएं भग जाएंगी ।।

लेकिन सपने सब टूट गए ,
लगा सभी को ऐंठा है ।
इत महगाई सिर चढ़ बोलेे ,
उत मुन्ना घर बैठा है ।।

घर -घर की हालत खस्ता है, पीड़ित सब बदहाली से ।
कंगाली में आटा गीला ,
छीनी रोटी थाली से ।।

भ्रष्टाचार मिटाने वालों ,
नहीं सुनाई देता है ।
भ्रष्टाचारी हर अधिकारी ,
दूनी रिश्वत लेता है ।।

पहले कोमल कलियां तोड़े ,
फिर उत्पात मचाता है ।
किसने दे दी छूट यहां पर ,
क्या माली सो जाता है ।।

जनता के जज्बात यहां पर ,
ऐसे ना लड़ पाएंगे ।
मंदिर – मस्जिद के गुब्बारे ,
पुनः नहीं फट पाएंगे ।।

सबका साथ विकास सभी का
नारा सच करना होगा ।
गुलशन के इस आलेखन में ,
प्रेम सुधा भरना होगा ।।

शिव कुमार ‘दीपक’

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