#Kavita by Shiv Kumar Pandit

राम के द्वार

जब जब चाहा पैर रखने की

स्वयंभू द्वारपाल

दूर से ही कड़कता

अनुमति नहीं है अंदर जाने की

ऊँची संस्कृति पाने की

 

राम के द्वार

जब जब चाहा देखने की

स्वयंभू पहरेदार

दूर से ही गरजता

अनुमति नहीं है नजर उठाने की

आत्म सम्मान जगाने की

 

राम के द्वार

जब जब चाहा दीप जलाना

अग्नि के रक्षपाल

दूर से ही गुर्राता

अनुमति नहीं है आग जलाने की

सामाजिक विकास पाने की

 

राम के द्वार

जब जब चाहा सिर झुकाना

शिष्टाचार के आचार्य

दूर से ही धमकाया

अनुमति नहीं है मंदिर जाने की

गौरव गान गाने की

 

राम के द्वार

तब एक भीम आता है

जन जन को समझाता है

पूजा में याचना नहीं

अधिकार हो

वह कर्म करो जो सबको स्वीकार हो

शिव कुमार पंडित

 

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