#Kavita by Shiv Kumar Pandit

शिक्षक ने कहा पहाड़ा लिख

छात्र ने पहाड़ बना दिया

कौपी पर पेंसिल लहराया

थोड़ा जुगाड़ लगा दिया

पहाड़ समझा था छात्र मगर

पहाड़ भी कब देखा था

कल्पना के सागर में डूबा

कुछेक कंकड़ फेंका था

दस तक गिनती का पता नहीं

पहाड़ा कैसे लिखेगा

सादे कागज के पन्नों पर

क्रूर चेहरा दीखेगा

कोई जालिम खड़ा सामने

दाँत निपोर बुलाता है

बिन पटवन के बंजर भू पर

निगंध फूल खिलाता है

पानी को मथ मथ कर मक्खन

कैसे कोई पाएगा

इठलाते नाजुक फूल भला

क्या पत्थर सह पाएगा

शिव कुमार पंडित

 

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