#Kavita by Shivanand Singh Sahayogi

कहाँ नदी में नीर बचा है

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कहाँ नदी में नीर बचा है

कविता जहाँ नहाये

 

भाव-पहाड़ी जमी पड़ी है

झील निकल सी उजली

श्वेतपत्र जारी ठण्डक की

धरा विजल सी धुँधली

सूरज धुंध-रजाई ओढ़े

शब्द-दूध गोरसी जलाकर

कवि लय को पिलवाये

 

छींक रहा है गीत और फिर

गजलें खाँस रही हैं

दोहों में कुछ उथल-पुथल है

क्षणिका ढाँस रही है

कथरी में चिपका असमंजस

व्यथा बुलाकर भावचित्र को

आंगन में समझाये

 

श्लोकों ने बदले अवलोकन

बदली कहन कहानी

दादा-दादी भूले लोरी

भूले नाना-नानी

सुबह-शाम रंगीनी सी हैं

नष्टप्राय है अब नैतिकता

बोतल कुछ उतराये

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ –मेरठ

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