#Kavita by Shivanand Singh Sahyogi

नई सदी का भोर

आसमान को छूने निकले

हैं महलों के पेड़

 

बौनी है गमलों में डाली

तने हुये कमजोर

कई मंजिलों ऊपर सोता

नई सदी का भोर

बरगद-पीपल गिद्ध हो गये

नींव हो गये बेड़

 

कहीं-कहीं पर दिख जाती है

हरियाली की पीठ

घने जंगलों में अंधेरा

बहुत हो चुका ढीठ

मौन खड़ी हर मर्यादा को

नयन रहे हैं छेड़

 

ईंट-ईंट में चुनी गई है

फसलों की आवाज

हर्षोदय के नये शहर में

उन्नति का ऋतुराज

उभरे पानी के तलवे की

कंकरीट की एड़

शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’

मेरठ

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.