#Kavita by shivmurti tripathi ‘chandresh’

रोज रोज हो रहा तमाशा संसद में |
दिन दूनी बढ़ रही पिपासा संसद में ||

संविधान की लाज बचाओगे कैसे |
छाया है घनघोर कुहासा संसद में ||

माइक चप्पल कुर्सी की बौछारें हैं |
लोकतंत्र की ये परिभाषा संसद में ||

सभी निगलने की खातिर मुँह बाये हैं |
देश हमारा बना बताशा संसद में ||

लूट पाट कर उन्हें तिजोरी भरने दें |
मत रखना कोई अभिलाषा संसद में ||

गाँधी की खादी रोती है किस्मत पर |
एक जगह इतने दुर्वाशा संसद में ||

लगते हैं शालीन लका दक कपड़ों में |
शर्मसार है उनकी भाषा संसद में ||

जनता का हित लगा दांव पर चौसर में |
फेंक रहे सब अपना पासा संसद में ||

पल भर में ‘चंद्रेश’ करोड़ी लाल हुए |
कौन करेगा राज़ खुलासा संसद में ||

शिव मूर्ति त्रिपाठी ;चंद्रेश;

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