#Kavita by Shrish Mishra

राष्ट्रदिवस पर आज तिरंगा फहराना अपराध हुआ,
देश प्रेम में भारत माँ की जय गाना अपराध हुआ।
कैसी है ये आज़ादी और कैसा ये क़ानून यहां,
राष्ट्रपर्व पर खुशी मनाये उसका ही घर सून यहां।
चंदन की माँ को भी अब देने जवाब कोई आये,
उसके मन की पीड़ा का देने हिसाब कोई आये।
दर्द कलेजे पर सहकर भी स्वाभिमान से बोली वो,
ध्वज फहराना देशद्रोह तो मार दें उसको गोली वो।
हर मुद्दे पर कलम चलाने वालों ने कुछ नहीं लिखा,
शोक जताने वालों में भी उनका चेहरा नहीं दिखा।
क़ातिल कोई भी हो पर सजा उसे मिल जाए बस,
पत्रकार निष्पक्ष रूप से धर्म ढूंढ के लाये बस।
हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा नज़र नहीं अब आता है,
वोटबैंक नेताओं से जाने क्या क्या करवाता है।
भाई, भाई को काट रहा पर इनकी तो मंशा है यही,
जले न कोई बैर अग्नि में मेरी अनुशंसा है यही।
मिलकर साथ चले न हम तो देश टूट ही जाएगा,
ख़ुदा करेगा माफ नहीं भगवान रूठ भी जाएगा।
               श्रीश मिश्र

One thought on “#Kavita by Shrish Mishra

  • July 21, 2018 at 7:50 am
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    Excellent I m proud of u

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