#Kavita by Shyam Achal

मेरा निर्माता

 

वह चट्टानों को तोड़ता रहा

बनाता रहा हमारे लिए रास्ते

 

अपने खून को निचोड़कर

पसीना बनाकर,

बुझाता रहा हमारी प्यास

 

हमेशा मुफलिसी में

देता रहा सांत्वना

कहता कि महिने में एक दिन ना खाने से

स्वथ्य रहता है शरीर

फला ,फला ,फला महापुरूष

एकबार ही खाते थे दिन में

 

मेरे लिए लाता हर त्योहार पर नये कपड़े

वह फटे – चिथे कपड़े पहनकर

खेल लेता होली

जला लेता दिवाली का दिया

जला देता दशहरे के रावण को

 

और मुस्कराते हुए कहता

गादर गूदर सोवई

मरजाद वाले रोवई

 

आज़ अब इस मोड़ पर आ कर

मैं समझ रहा हूँ थोड़ा – थोड़ा

 

आखिर क्यूँ रहता था

हर महिने एकादशी का व्रत

मेरा निर्माता ..  मेरा पिता

नही …नही .. महान पिता!

 

 

— श्याम अचल “प्रियात्मीय”

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