#Kavita by Subodh Srivastava

शिल्पकार

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तुम,

सचमुच महान हो

शिल्पकार-

तुम्हारे हाथ

नहीं दुलारते बच्चों को

न हीं गूंथते हैं फूल

अर्धागनी के केशों में

बस, उलझे रहते हैं

‘ताज’ बनाने में-

और / बाद में

फेंक दिये जाते हैं

काटकर,

तब भी/ आखिर क्यों

नहीं कम होता

तुम्हारा

‘ताज’ के प्रति अनुराग?

…..

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