#Kavita by Sudha Mishra

चीख

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बम धमाकों में बिखरे

चीथड़े अबतक आँखों को सोने नहीं देते

ये कुछ बीमार को देख

सहमने लगे हैं या घरियाली आँसू बहाने लगे हैं

मुझे दंगों की पैंतालिस खौफनाक रातों की

चीखें अब भी सुनायी देती है

मैं अब भी सड़क चलते

मह्सूस करती हूँ

पीछे-पीछे आते कदमों की आहट

डर से कई-कई बार पलट कर देखा है

कि आते हुए आदमी के हाथ में

खंजर तो नहीं

धर्म के अन्धे हत्यारे तो नहीं

धर्म भी क्या जो बहक जाये किसी के इशारे पर

अमादा हो इन्सान एक-दुसरे के खूंँ खराबे पर

वो दर्द भूलने वालों तुम्हारे दर्द सिर्फ तस्विरी है

जो दल के साथ -साथ चलता है

ध्यान से देखो

सदियों की यही गाथा है

अपनी-अपनी स्वार्थ -सिद्धि–

—–सुधा मिश्रा बम धमाकों में बिखरे

चीथड़े अबतक आँखों को सोने नहीं देते

ये कुछ बीमार को देख

सहमने लगे हैं या घरियाली आँसू बहाने लगे हैं

मुझे दंगों की पैंतालिस खौफनाक रातों की

चीखें अब भी सुनायी देती है

मैं अब भी सड़क चलते

मह्सूस करती हूँ

पीछे-पीछे आते कदमों की आहट

डर से कई-कई बार पलट कर देखा है

कि आते हुए आदमी के हाथ में

खंजर तो नहीं

धर्म के अन्धे हत्यारे तो नहीं

धर्म भी क्या जो बहक जाये किसी के इशारे पर

अमादा हो इन्सान एक-दुसरे के खूंँ खराबे पर

वो दर्द भूलने वालों तुम्हारे दर्द सिर्फ तस्विरी है

जो दल के साथ -साथ चलता है

ध्यान से देखो

सदियों की यही गाथा है

अपनी-अपनी स्वार्थ -सिद्धि–

—–सुधा मिश्रा

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