#Kavita by Sufi Jakir Nawaji

कविता

आजादी के दशको बाद ,
सोच रहा हूँ फिर से आज ।
कितनी बाकी है गुलामी ,
कितने हुए हम आजाद ।
धर्म के नाम पर
‘पाखण्ड’ ,
राष्टवाद के पर्दे में ,
फैलता ,
आतंक ।
ऊंची नीची जातियों,
हिन्दी – अहिन्दी भाषियों,
सांप्रदायिक नफरतों ,
और ,
क्षेत्रवाद के बीच ।
ढूंढ रहा हूँ ,
एक भारतीय आजाद।
स्वतंत्रता और समानता,
न्याय और संप्रभुता,
लोकतन्त्र और भाईचारा,
के सपनो के बीच ,
जलता संविधान ।
जनतंत्र को,
मुंह चिढाती ,
भीड का धुंधलाया काला चहरा,
लोकतांत्रिक विचारों पर,
संकीर्णता का पहरा ।
ज्ञान और विज्ञान का,
बुद्धि और आत्मसम्मान का,
हो रहा क्या विकास ?
संसद में तानाशाही,
न्याय पालिका में शंकाए,
मिडीया और अर्थ ,
खोता अपना विश्वास ।
आजादी के दशकों बाद,
सोच रहा हूँ फिर से आज।
क्या हो पाएगा ?
मेरा भारत ।
उन सपनो सा आजाद ।।
सूफी जाकिर नवाजी

3 thoughts on “#Kavita by Sufi Jakir Nawaji

  • August 13, 2018 at 6:40 am
    Permalink

    वाह बहुत ही उम्दा

  • August 13, 2018 at 7:22 am
    Permalink

    bhut khub kaha
    bhut acchi bat he janab
    bhut acchi soch he
    allah apko diniya ki tamam ki khushiyan ata kare

  • August 13, 2018 at 9:24 am
    Permalink

    Superb Sir Jiii

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