#Kavita by Sunil Gupta

“कैसे-बीती रैन?”
“साथी गहराती रात,
अमावश की-
छीने मन का चैन।
जाने न जीवन-साथी,
ऐसे में-
कैसे -बीती रैन?
आशा की किरण जागे,
मिले साथी-
उज्जवल होती रैन।
भोर का उजाला ही,
देता साथी-
कुछ पल मन को चैन।
जग के कोलाहल में,
खो जाती साथी-
जीवन की पहचान।
कह सके न किसी से,
तन-मन की-
कैसे-आये चैन?
मैं-ही-मैं में साथी,
पल-पल-
यूंही बीती रैन।।
ःःःःःःःःःःःःःःःःःः
सुनील कुमार गुप्ता

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