#Kavita by Sunil Gupta

“बसेरा”
“जहाँ बैठे वही बसेरा,
साँझ हो या सबेरा।
सारी दुनियाँ हैं सिमटी,
यहाँ कौन-तेरा मेरा?
माँगे हैं खाना -पीना,
ऐठ से हैं-रहना।
धरती है बिछौना अपना,
अंबर हैं-ओढन मेरा।।
चिन्ता न यहाँ अपनो की,
नंगा हैं-बच्चा तेरा।
कैसा-होगा कल इसका,
दिखे हैं सामने तेरा।।”
ःःःःःःःःःःःःःःःःःसुनील कुमार गुप्ता

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