#Kavita By Sunil Gupta

“यथार्थ”
“आज और कल में,
अन्तर फिर-
बढ़ता गया।
सम्पन्नता के साथ-साथ,
विचारो में-
सन्नाटा छाता गया।
अपन्त्व का बंधन भी,
धीरे-धीरे-
टूटता गया।
मैं-ही-मैं मे यहाँ,
जीवन तो-
सिमटता गया।
पिता भी जीवन में,
सूख ढू़ंढते-ढूंढते-
बुढा गया।
आलीशान महल के ,
कोने मे-
सब कुछ सिमट गया।
आज और कल मे,
अन्तर फिर-
बढ़ता गया।।”
सुनील कुमार गुप्ता

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