#Kavita By Sunil gupta

“कहाँ-चले जा रहे हो?”

“साथी इस जीवन -पथ के,
बंद रास्तो पर तुम-
कहाँ -चले जा रहे हो?
दिशाहीन पथ -भ्रष्ट हो साथी,
मंज़िल पाने की तुम-
क्यों-आस जगा रहे हो?
छलावा है-इन नेताओ का साथी,
अच्छे दिनो की चाह में तुम-
क्यों-वर्तमान भूला रहे हो?
सत्य-पथ पर चल कर साथी,
फूको शंखनाद श्रम का तुम-
क्यों-लक्ष्य भूला रहे हो?
साथी इस जीवन पथ के,
बंद रास्तो पर तुम-
कहाँ-चले जा रहे हो?
सुनील कुमार गुप्ता

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