#Kavita by Surendra Kumar Arora

प्रिय कैसे , फिर  तुम्हें मनाऊँ

ह्रदय ने हर छण  पीर सही है

श्वासों की  तुम संग प्रीत  लगी  है

तुमको लेकर बात बढ़ी है

तुम बिन चॆन कहां से पाऊँ

प्रिय कैसे , फिर  तुम्हें मनाऊँ  .

 

चितवन ऐसी खिली कली सी

स्वर लहरी है जल – तरंग सी

नयनों की झपकी , साझं ढली सी

बिछड़ा सावन कहाँ से लाऊँ

प्रिय कैसे , फिर  तुम्हें मनाऊँ .

 

नेह मधुर है  , स्पर्श है कोमल

धरती पर छाया स्वर्ग सा उपवन

गंगा की पूजित धारा  सा निर्मल

तुम सा साथी कित  ढूणू  , कित पाऊं

प्रिय कैसे , फिर  तुम्हें मनाऊँ .

 

जो तुम होती मेरी बगिया में

खिलते फूलों के संग  खिलता

जो , पत – झड़ आता जीवन में

उसे ही नियति के नियम सा लेता

पर यह  पत – झड़ कैसे दूर भगाऊँ

प्रिय ,कैसे  फिर  तुम्हें मनाऊँ

 

तुम रुठे हो  , रूठा जग सारा

कोई भी जग में  , लगता  नहीं प्यारा

उग आया सूरज पर सुबह नहीं है

तन में उर्जा कहाँ से पाऊँ

प्रिय कैसे , फिर  तुम्हें मनाऊँ .

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